Sunday, 22 July 2012

आ गई निर्णय की घड़ी


 राष्ट्रपति चुनाव में संप्रग के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी की जीत यूं तो निश्चित दिख रही है लेकिन इस पर मुहर रविवार को होने वाली चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद ही लगेगी। मुखर्जी का मुकाबला एनडीए समर्थित प्रत्याशी संगमा से है। नए राष्ट्रपति 25 जुलाई को शपथ लेंगे।
राज्यसभा के महासचिव व पीठासीन अधिकारी वीके अग्निहोत्री ने बताया कि मतगणना के मद्देनजर राज्यसभा सचिवालय ने सुरक्षा के सभी आवश्यक इंतजाम किए है। मतों की गिनती संसद भवन के कमरा नंबर 63 में सुबह 11:00 बजे शुरू होगी और दोपहर तक परिणाम घोषित हो जाएंगे। 776 सांसदों और राज्य विधानसभाओं के 4120 विधायकों में उम्मीद से कम करीब 72 फीसद ने मतदान किया। मतदान से एक दिन पहले तृणमूल कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने का एलान कर उनकी जीत पर मुहर लगा दी थी। उन्हे संप्रग के सभी घटक दलों के साथ सपा, बसपा, राजद और माकपा का भी वोट मिला। राजग खेमे के जदयू और शिवसेना के अलावा वाईएसआर कांग्रेस ने भी मुखर्जी की उम्मीदवारी का समर्थन किया था। संगमा को भाजपा के अलावा अन्नाद्रमुक और बीजद ने समर्थन दिया था।

न्यू मीडिया क्या है?


'न्यू मीडिया' संचार का वह संवादात्मक (Interactive)स्वरूप है जिसमें इंटरनेट का उपयोग करते हुए हम पॉडकास्ट, आर एस एस फीड, सोशल नेटवर्क (फेसबुक, माई स्पेस, ट्वीट्र), ब्लाग्स, विक्किस, टैक्सट मैसेजिंग इत्यादि का उपयोग करते हुए पारस्परिकसंवाद स्थापित करते हैं। यह संवाद माध्यम बहु-संचार संवाद का रूप धारण कर लेता है जिसमें पाठक/दर्शक/श्रोता तुरंत अपनी टिप्पणी न केवल लेखक/प्रकाशक से साझा कर सकते हैं, बल्कि अन्य लोग भी प्रकाशित/प्रसारित/संचारित विषय-वस्तु पर अपनी टिप्पणी दे सकते हैं। यह टिप्पणियां एक से अधिक भी हो सकती है अर्थात बहुधा सशक्त टिप्पणियां परिचर्चा में परिवर्तित हो जाती हैं। उदाहरणत: आप फेसबुक को ही लें - यदि आप कोई संदेश प्रकाशित करते हैं और बहुत से लोग आपकी विषय-वस्तु पर टिप्पणी देते हैं तो कई बार पाठक-वर्ग परस्पर परिचर्चा आरम्भ कर देते हैं और लेखक एक से अधिक टिप्पणियों का उत्तरदेता है।न्यू मीडिया वास्तव में परम्परागत मीडिया का संशोधित रूप है जिसमें तकनीकी क्रांतिकारी परिवर्तन व इसका नया रूप सम्मलित है।
न्यू मीडिया संसाधनन्यू मीडिया का प्रयोग करने हेतु कम्प्यूटर, मोबाइल जैसे उपकरण जिनमें इंटरनेट की सुविधा हो, की आवश्यकता होती है। न्यू मीडिया प्रत्येक व्यक्ति कोविषय-वस्तु का सृजन, परिवर्धन, विषय-वस्तु का अन्य लोगों से साझा करने का अवसर समान रूप से प्रदान करता है। न्यू मीडिया के लिए उपयोग किए जाने वाले संसाधन अधिकतर निशुल्क या काफी सस्ते उपलब्ध हो जाते हैं।
न्यू मीडिया का भविष्ययह सत्य है कि समय के अंतराल के साथ न्यू मीडियाकी परिभाषा और रूप दोनो बदल जाएं। जो आज नया है संभवत भविष्य में नया न रह जाएगा यथा इसे और संज्ञा दे दी जाए। भविष्य में इसके अभिलक्षणों में बदलाव, विकास या अन्य मीडिया में विलीन होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।न्यू मीडिया ने बड़े सशक्त रूप से प्रचलित पत्रकारिता को प्रभावित किया है। ज्यों-ज्यों नई तकनीक,आधुनिक सूचना-प्रणाली विकसित हो रही है त्यों-त्योंसंचार माध्यमों व पत्रकारिता में बदलाव अवश्यंभावी है।- रोहित कुमार 'हैप्पी'
 न्यू मीडिया और ऑनलाइन पत्रकारिता की नई माँगेंवेब पत्रकारिता की भाषा
 
न्यू मीडिया
न्यू मीडिया विशेषज्ञ या साधकआप पिछले १५ सालों से ब्लागिंग कर रहे हैं, लंबे समय से फेसबुक, ट्विटर,यूट्यूब इत्यादि का उपयोग कर रहे हैं जिसके लिए आप इंटरनेट, मोबाइल व कम्प्यूटर का प्रयोग भी करते हैं तो क्या आप न्यू मीडिया विशेषज्ञ हुए?ब्लागिंग करना व मोबाइल से फोटो अपलोड कर देना ही काफी नहीं है। आपको इन सभी का विस्तृत व आंतरिक ज्ञान भी आवश्यक है। न्यू मीडिया की आधारभूत वांछित योग्यताओं की सूची काफी लंबी है और अब तो अनेक शैक्षणिक संस्थान केवल  'न्यू मीडिया' का विशेष प्रशिक्षण भी दे रहे हैं या पत्रकारिता में इसे सम्मिलित कर चुके हैं।ब्लागिंग के लिए आप सर्वथा स्वतंत्र है लेकिन आपको अपनी मर्यादाओं का ज्ञान और मौलिक अधिकारों की स्वतंत्रता की सीमाओं का भान भी आवश्यक है। आपकी भाषा मर्यादित हो और आप आत्मसंयम बरतें अन्यथा जनसंचार के इन संसाधनों का कोई विशेष अर्थ व सार्थक परिणाम नहीं होगा। इंटरनेट पर पत्रकारिता के विभिन्न रूप सामने आए हैं -
  • अभिमत - जो पूर्णतया आपके विचारों पर आधारित है जैसे ब्लागिंग
  • , फेसबुक या टिप्पणियां देना इत्यादि।
  • प्रकाशित सामग्री या उपलब्ध सामग्री का वेब प्रकाशन
  •   - जैसे समाचारपत्र-पत्रिकाओं के वेब अवतार।
  • पोर्टल व वेब पत्र-पत्रकाएं (ई-पेपर और ई-जीन जिसे वेबजीन भी कहा जाता है)
  • पॉडकास्ट - जो वेब पर प्रसारण का साधन है।
कोई भी व्यक्ति जो 'न्यू मीडिया' के साथ किसी भी रूप में जुड़ा हुआ है किंतु वांछित योग्यताएं नहीं रखता उसे हम 'न्यू मीडिया विशेषज्ञ' न कह कर 'न्यू मीडिया साधक' कहना अधिक उपयुक्त समझते हैं। 
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वेब पत्रकारिता लेखन व भाषा 
वेब पत्रकारिता, प्रकाशन और प्रसारण की भाषा में आधारभूत अंतर है। प्रसारण व वेब-पत्रकारिता की भाषा में कुछ समानताएं हैं। रेडियो/टीवी प्रसारणों में भी साहित्यिक भाषा, जटिल व  लंबे शब्दों से बचा जाता है। आप किसी प्रसारण में, 'हेतु, प्रकाशनाधीन, प्रकाशनार्थ, किंचित, कदापि,यथोचित इत्यादि' जैसे शब्दों का उपयोग नहीं पाएँगे।   कारण?  प्रसारण ऐसे शब्दों से बचने का प्रयास करते हैं जो उच्चारण की दृष्टि से असहज हों या जन-साधारण की समझ में न आएं। ठीक वैसे ही वेब-पत्रिकारिता की भाषा भी सहज-सरल होती है।वेब का हिंदी पाठक-वर्ग आरंभिक दौर में अधिकतर ऐसे लोग थे जो वेब पर अपनी भाषा पढ़ना चाहते थे, कुछ ऐसे लोग थे जो विदेशों में बसे हुए थे किंतु अपनी भाषा से जुड़े रहना चाहते थे या कुछ ऐसे लोग जिन्हें किंहीं कारणों से हिंदी सामग्री उपलब्ध नहीं थी जिसके कारण वे किसी भी तरह की हिंदी सामग्री पढ़ने के लिए तैयार थे। आज परिस्थितिएं बदल गई हैं मुख्यधारा वाला मीडिया आनलाइन उपलब्ध है और पाठक के पास सामग्री चयनित करने का विकल्प है।इंटरनेट का पाठक अधिकतर जल्दी में होता है और उसे बांधे रखने के लिए आपकी सामग्री पठनीय, रूचिकर व आकर्षक हो यह बहुत आवश्यक है। यदि हम ऑनलाइन समाचार-पत्र की बात करें तो भाषा सरल, छोटे वाक्य व पैराग्राफ भी अधिक लंबे नहीं होने चाहिएं। 
विशुद्ध साहित्यिक रुचि रखने वाले लोग भी अब वेब पाठक हैं और वे वेब पर लंबी कहानियां व साहित्य पढ़ते हैं। उनकी सुविधा को देखते हुए भविष्य में साहित्य डाऊनलोड करने का प्रावधान अधिक उपयोग किया जाएगा ऐसी प्रबल संभावना है।  साहित्यि क वेबसाइटें स्तरीय साहित्यका प्रकाशन कर रही हैं और वे निःसंदेह साहित्यिक भाषा का उपयोग कर रही हैं लेकिन उनके पास ऐसा पाठक वर्ग तैयार हो चुका है जो साहित्यिक भाषा को वरियता देता है।सामान्य वेबसाइट के पाठक जटिल शब्दों के प्रयोग व  साहित्यिक भाषा से उकता जाते हैं और वे आम बोल-चाल की भाषा अधिक पसंद करते हैं अन्यथा वे एक-आध मिनट ही साइट पर रूककर साइट से बाहर चले जाते हैं।
सामान्य पाठक-वर्ग को बाँधे रखने के लिए आवश्यक है कि साइट का रूप-रंग आकर्षक हो, छायाचित्र व ग्राफ्किस  अर्थपूर्ण हों, वाक्य और पैराग्राफ़ छोटे हों, भाषा सहज व सरल हो। भाषा खीचड़ी न हो लेकिन यदि उर्दू या अंग्रेज़ी के प्रचलित  शब्दों का उपयोग करना पड़े तो इसमें कोई बुरी बात न होगी। भाषा सहज होनी चाहिए शब्दों का ठूंसा जाना किसी भी लेखन को अप्रिय बना देता है।- रोहित कुमार 'हैप्पी'
 न्यू मीडिया क्या है?न्यू मीडिया और ऑनलाइन पत्रकारिता की नई माँगेंवेब पत्रकारिता की भाषा न्यू मीडिया विशेषज्ञ या साधक3न्यू मीडिया और ऑनलाइन पत्रकारिता की नई माँगें नि:संदेह न्यू मीडिया बड़े सशक्त रूप से परंपरागतप्रचलित मीडिया को प्रभावित कर रहा है। आज पत्रकारों को  न्यू मीडिया से जुड़ने के लिए नई तकनीक, आधुनिक सूचना-प्रणाली, सोशल-मीडिया, सर्च इंजन प्रवीणता और वेब शब्दावली से परिचय होना अति-आवश्यक हो गया है। केवल ब्लागिंग मात्र करने से आप संपूर्ण वेब-पत्रकार नहीं कहलाते। वेब-पत्रकारिता का क्षेत्र काफी विस्तृत है और आपको पत्रकारिता के अतिरिक्त वेब, मल्टीमीडिया, सर्च इंजन और उनकी कार्यप्रणाली व ग्रॉफिक की समझ होनी चाहिए। इन तत्वों के बिना भी आप न्यू मीडिया में काम तो कर सकते हैं परंतु एक सक्षम वेब पत्रकार के लिए इनमें प्रवीणता हासिल करना उपयोगी होगा।आइए, देखें एक वेब पत्रकार के लिए किन-किन योग्यताओं की आवश्यकता होती है:
  • पत्रकारिता का ज्ञान
  • इंटरनेट
  •  का उपयोग
  • सर्च इंजन उपयोग में दक्षता
  • इंटरनेट इंवेस्टिगेश
  • यदि हम हिंदी वेब पत्रकारिता में काम करना चाहते हैं तो
  •  हिंदी यूनिकोड का ज्ञान व हिंदी टंकण
  • सी एम एस
  •  (कांटेंट मैनेजमैंट स्सिटम) जैसे जुमला, वर्ड प्रैस, सी एम एस एम एस इत्यादि
  • यू ट्यूब
  •  इत्यादि पर वीडियो अपलोड कैसे करे, मैटा टैग कैसे लिखे इत्यादि
  • बेसिक ग्रॉफिक का ज्ञान जैसे अडोबी फोटोशॉप पर फोटो को संपादित करना व उसे वेब के लिए तैयार करना
  • बेसिक वीडियो व ऑडीओ
  •  एडटिंग
  • पॉडकास्ट
  • आर एस एस फीड
  • सोशल नेटवर्क (फेसबुक
  • , माई स्पेस, गूगल प्लस, ट्विटर),
उपरोक्त अधिकतर योग्यताओं में यदि पूर्ण निपुणता न भी हो लेकिन इनका आधारभूत ज्ञान न होने पर वेब-पत्रकारिता का सफल होना संभव नहीं। हाँ,आप परंपरागत पत्रकारिता को ही वेब-पत्रकारिता कहते या समझते रहे तो अलग बात है।- रोहित कुमार 'हैप्पी'
न्यू मीडिया क्या है?न्यू मीडिया और ऑनलाइन पत्रकारिता की नई माँगेंवेब पत्रकारिता की भाषान्यू मीडिया विशेषज्ञ या साधक

पत्रकारिता: एक परिचय


पत्रकारिता: एक परिचय
प्रस्तावना

हमारे देश में पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में माना जाता है। क्योंकि यह जन-जन की अभिव्यक्ति को मुखर रूप से व्यक्त करने का जनतांत्रिक तरीका है। पत्रकारिता के उस रूप को हम सभी जानते हैं, जब स्वतंत्रता का संघर्ष मिशन की भावना से कलम के योद्धाओं ने लड़ा था। स्वतंत्रता संघर्ष के इस दौर में पत्रकारिता का एकमात्र लक्ष्य आजादी हासिल करना और जनता में चेतना जागृत करना रहा। सभी देशों में पत्रकारिता को अभिव्यक्ति की स्वतांत्र्य भावना के परिप्रेक्ष्य में लिया जाता है। भारत में यद्यपि आजादी के पाँच दशक ही हुए हैं, फिर भी पत्रकारिता का क्षेत्र उत्तरोत्तर नए अवसरों और नई तकनीकी चुनौतियों से भरा क्षेत्र मानते हैं। पत्रकारिता में प्रवेश करने वाले विद्यार्थियों के लिए इसके परिचय, सिद्धांतों तथा संवैधानिक पहलुओं से अवश्य परिचय होना चाहिए।

शुरूआत में पत्रकारिता का अर्थ, क्षेत्र, इतिहास और उसके विकास पर चर्चा की गई है। इकाई दो में स्वतंत्रता से पूर्व भारत की पत्रकारिता मध्य प्रदेश का विशेष संदर्भ लेते हुए की गई है।
स्वतंत्रता के बाद प्रेस की भूमिका और स्वातंत्र्य पर विवरण भी है। इस में प्रेस से संबंधित कानूनों पर सिलसिलेवार प्रकाश डाला गया है। विद्यार्थियों से अपेक्षा है कि वे इन सामग्रियों का अध्ययन ठीक ढंग से करते हुए पत्रकारिता के मानदण्डों को समझने का प्रयास करें।

पत्रकारिता और रिपोर्टिंग
समाचार परिभाषा

समाचार के संबंध में अनेक प्रकार के मत प्रचलित हैं। उसकी परिभाषा विभिन्न व्यक्तियों तथा स्थानों की दृष्टि पर आधारित है।
पश्चिमी देशों की दृष्टि में केवल माध्यम ही महत्त्वपूर्ण है। उसी को सबसे अधिक महत्त्व दिया जाता है।
15वीं शताब्दी में समाचार की परिभाषा का स्वभाव संबंधित व्यक्तियों के कारण बदलता रहा है। 17वीं शताब्दी में सबसे पहले एक आधुनिक समाचार पत्र निकला। इस समाचार में छपने वाली संसद की कार्यवाही के संबंध में उत्तेजक रिपोर्टिंग के कारण उस युग के लोगों के जीवन पर गहरी छाप पड़ी। इसका परिणाम यह हुआ कि उस दौर के प्रसिद्ध संसद सदस्य ‘एडमंड बर्क’ को यह टिप्पणी देने पर उत्साहित होना पड़ा कि ‘यह लोगों को मनचाहे’ कहने और देश की जनता को आजाद कराने का अधिकार किसने दिया ? क्या यह ‘चौथा शासन’ है ? (उस समय तक केवल तीन प्रशासकों को मान्यता मिली थी-दि हाऊस ऑफ क़ॉमन्स, दि हाऊस ऑफ लॉर्डस् और न्यायाधीश वर्ग) इस टिप्पणी की अनेक प्रकार के व्यक्तियों ने अनेक प्रकार की दृष्टि से अर्थ लगाने की कोशिश की है। पत्रकार वर्ग इसको जनता का चौथा शासन का नाम देता है।
हमारे देश में सम्राट अशोक के युग से पत्थरों पर समाचार छापे जाते थे तथा वे मुगल शासक अकबर के युग में ‘वाकिया नवीस’ के माध्यम से प्राप्त समाचार, सभी यही कहते हैं कि समाचार जनता के लिए उनकी आवश्यकतानुसार सूचना देना वाला होना चाहिए और प्राचीन काल में समाचारों का जो उद्देश्य था कुछ ऐसा ही था। किन्तु आज के आधुनिक युग में समाचार जनता के बीच एक से दूसरे मुख तक बड़ी तीव्र गति से प्रसारित होते हैं। हालांकि आज के युग में ‘जन संचार’ के क्षेत्र में बहुत ज्यादा प्रगति हो गयी है। प्रिन्ट माध्यम में भी और इलेक्ट्रानिक माध्यम में भी। इस प्रगति के बावजूद हमारे देश की जनता में आज भी उसी प्राचीन प्रथा का चलन है। जनसंख्या में समाचार का प्रसार व्यक्ति-व्यक्ति के माध्यम से ही होता है।

समाचार पत्रों के अधिकतर संपादक पाठकों की इच्छा के अनुसार समाचार की परिभाषा को निश्चित करने का प्रयास करते हैं। दूसरे में पाठक जिस चीज की माँग करता है, वहीं कुछ देने की संपादक वर्ग कोशिश करता है। चाहे वह स्थानीय समाचार हो, फीचर्स हों, क्रिकेट समाचार हों या और कोई समाचार। कुछ संपादक समाचार की परिभाषा इसी प्रकार करते हैं कि पाठकों को क्या ज्ञात होना चाहिए आज के जटिल आश्चर्यचकित करने वाले युग में पाठक के जीवन की सुखरूपता के लिए कौन-कौन-सी जानकारियां आवश्यक है, वे सब समाचार हैं।
इस प्रकार से ‘समाचार’ की कई प्रकार की परिभाषाएं प्रचलित हैं। ‘समाचार उसको भी कहते हैं, जो समाचार अधिक से अधिक जनसंख्या के लिए रूचिकारक तथा महत्वपूर्ण हों।’ दूसरे शब्दों में ‘समाचार’ घटना-तथ्य, तथा भिन्न-भिन्न प्रकार की सामाजिक गतिविधियों के संबंध में समय पर अधिक से अधिक जनसंख्या के लिए रूचिकारक हो। समाचार किसी भी ताजा घटना की ताजा जानकारी का अंश होता है, जो जनता पर अपना प्रभाव डालता है तथा उनके लिए रूचि पैदा करता है।
रूचिकारक समाचारों पर पाठक वर्ग अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त जरूर करते हैं विशेषतः अनोखी तथा आश्चर्यजनक घटनाओं के संबंध में वे बहुत रूचि लेते हैं।
आपको समाचार की यह परिभाषा की जानकारी तो अवश्य याद होगी-
यदि कुत्ता मनुष्य को काट खाए तो यह समाचार नहीं है, किंतु मनुष्य कुत्ते को काट खाए तो यह समाचार कहलाता है।
एक प्रसिद्ध संपादक ने ‘‘समाचार’’ की परिभाषा इस प्रकार की है, ‘‘जो कुछ घटित होता है, वह या उसका कोई भाग जनता का ध्यान आकर्षित करता है, वह ‘‘समाचार’’ है।
आप जोसेफ पुलिट्जर के नाम से अच्छी तरह परिचित होंगे। इन्हीं के नाम से अन्तरराष्ट्रीय ‘‘पुलिट्जर अवार्ड’’ संस्थापित किया गया है। उन्होंने समाचार की यह परिभाषा की है-‘‘समाचार वह है, जिसे-‘‘असली, अनोखी, विशेष, नाटकीय, रोमांचकारी, जिज्ञासा- जनक, चातुरीपूर्ण, विनोदी, विषम और योग्य कहा जाता है।’’

समाचार मूल्यांकन

समाचार की परिभाषा उसकी विशेषताओं के अनुसार की जाती है। समयबद्धता, निकटता, रूचिकर, मनोरंजक, परिणामगर्भिता, अनोखापन आदि विशेषताओं के आधार पर परिभाषा होती है।
‘‘समाचार’’ का विषय एक समयबद्धता का विषय है। जर्नलिज्म (पत्रकारिता) यह शब्द लैटिन से आया है, जिसका अर्थ ‘‘दैनिक और पत्रकारिता’’ किसी भी घटना की ताजी और समय पर की जाने वाली रिपोर्टिंग को पत्रकारिता समझा जाता है।
निकटता का बहुत अधिक महत्व है। क्योंकि जनता को दूर-दूर के अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से ज्यादा आसपास की घटी घटनाओं में अधिक रूचि होती है साधारण व्यक्तियों से अधिक प्रसिद्ध और विशेष व्यक्तियों तथा घटनाओं में भी रूचि रहती है। पाठक वर्ग हर दिन होने वाली छोटी-छोटी घटनाओं के बारे में ध्यान नहीं देता, जिसका कोई निर्णय न निकलता हो और इन घटनाओं के कारण हमारे जीवन पर कोई विशेष प्रभाव पड़ता हो। समाचार अगर निराला, अनोखा तथा आश्चर्यजनक हो तो वह पाठकों के लिए बहुत ही मनोरंजक होता है। इसके अतिरिक्त मनोरंजक घटनाएं समाचार का महत्वपूर्ण भाग होती हैं। मानव जाति की मनोवृत्ति है कि दूसरे लोगों के संबंध में उसे अधिक रूचि होती है। दूसरे व्यक्तियों के बारे में जानकारियां प्राप्त करने में सभी बहुत उत्साहित होते हैं। समाचार के इन गुणों के अलावा कुछ दूसरे गुण भी हैं, जिसे तात्कालिक लाभ और दीर्घकालिक लाभ कहा जाता है। तात्कालिक लाभ वाले समाचार वे होते हैं, जो पाठको पर तुरन्त अपना प्रभाव डालते हैं।
उदाहरण के तौर पर क्रिकेट मैच के परिणाम अथवा किसी दुःखदायक घटना का समाचार तात्कालिक प्रभाव वाला होता है। दीर्घकालिक लाभ वाले समाचार वे होते हैं, जैसे कर सुधार या कानूनी निर्णय तथा संसदीय संशोधन के समाचार जो कि दीर्घ समय तक पाठकों के जीवन को प्रभावित करते हैं।

समाचार के आवश्यक तत्व

यहाँ हम समाचारों के कुछ आवश्यक तत्त्वों की चर्चा करेंगे।

1.स्पष्टता-

आपके समाचार लेखन के लिए वाक्य छोटे-छोटे होने चाहिए। हर एक अनुच्छेद के भीतर तीन या चार पंक्तियों का अंतर देना चाहिए। लेखन शुद्ध और स्पष्ट करने से पाठकों में समाचार पत्र पढ़ने की रूचि पैदा हो सकती है।

2.उद्देश्य-

आप अपने लेखन में अपने विचारों को मत मिलाइए, दूसरे व्यक्तियों के विचारों का और घटनाओं का लेखन उद्देश्यबद्धता के साथ लिखें, जितनी घटना हो उतना ही लेखन। किसी पक्ष के लिए लेखन करना पाठकों से विश्वासघात करने के समान है।

3.समानता-

रिपोर्टिंग करते समय समानता का पालन करना बहुत आवश्यक है। यदि आप किसी विवादास्पद विषय अथवा घटना की रिपोर्टिंग करने जा रहे हैं, तो आपका कर्तव्य है कि दोनों पहलुओं की रिपोर्टिंग करें। यदि कोई हड़ताल मनाई गई तो संवाददाता उस जगह पर जाते हुए हड़ताल कितनी सफल हुई, इसका लेखन यथार्थ के साथ करें। यदि किसी एक ही पक्ष का लेखन आप करेंगे तो आपके समाचार लेख में निष्पक्षता नहीं होगी। पाठकों का विश्वास इस प्रकार आप खो देंगे।

4.यथार्थ-

किसी भी समाचार में यथार्थता की बुनियादी जरूरत है। यदि आप यथार्थता को नजरअंदाज करेंगे तो आप पाठकों का विश्वास ग्रहण नहीं कर पाएंगे। इसलिए अपने लेख की जानकारियों तथा तथ्यों की बार-बार जांच करना आवश्यक है। नामों को, आंकड़ों तथा तथ्यों को शुद्धता के साथ लिखें। छोटी-छोटी गलतियों से बचे रहिए।

समाचार के स्रोत

संवाददाता को अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए विश्वसनीय संपर्क स्थापित करना चाहिए। जितना अधिक से अधिक संपर्क हो उतना ही उसके लिए लाभदायक होता है। क्योंकि यही संपर्क उसके लिए जानकारियों के साधन हो सकते हैं। समाचार साधन मुख्यतः सार्वजनिक सभाएं, रेडियो के समाचार, दूरदर्शन के प्रोग्राम, पत्रकार-सम्मेलन, समाचार संक्षिप्त विवरण, इसके अतिरिक्त संवाददाता के अपने निजी संपर्क ही महत्वपूर्ण होते हैं। ये निजी संपर्क सरकारी अथवा गैर सरकारी अधिकारियों, व्यावसायिक वर्ग, मंत्रियों के सचिव, जनसंपर्क कार्यालय की सतह तक सीमित हो सकते हैं। इस तरह दो प्रकार के समाचार साधन होते हैं, एक तो वही सर्वसाधारण साधन जो सभी जनता के लिए उपलब्ध रहते हैं, दूसरे निजी संपर्क साधन जो व्यक्ति विशेष तक सीमित होते हैं।

कभी-कभी अपने व्यक्तिगत साधनों का उल्लेख अपनी रिपोर्टिंग में करना आवश्यक होता है और कभी-कभी उन्हें छुपाना भी पड़ता है। विवादास्पद समाचार लेखन में निजी समाचार साधनों को छुपाना ही उपयुक्त होता है। संवाददाता का यह कर्तव्य है कि समाचार लेख तथ्यों पर निर्धारित होना चाहिए। यदि आवश्यक पड़े तो अपने पास टेपरिकार्डर रखिए और दस्तावेज इकट्ठा कीजिए।
अपराध और खोजी रिपोर्टिंग करते समय साधनों की सुरक्षा करना पहला कर्तव्य है। खोजी पत्रकारिता में राजनीतिक व्यक्तियों से मुठभेड़ भी हो सकती है। क्योंकि जो जानकारियां वे छुपाना चाहते हैं, संवाददाता उनको पाठकों के सामने रखना चाहता है। इसलिए संवाददाता को अपने ‘‘साधनों’’ को पवित्र समझकर उनकी रक्षा करनी चाहिए। कानूनी व्यवस्था तथा सरकारी अधिकारियों की ओर से साधनों का पता बताने का पत्रकार पर दबाव भी आ सकता है, किन्तु पत्रकारिता का यह पहला उसूल है कि अपने साधनों ‘स्रोत’ को छुपाएं और उसकी रक्षा करें।

संवाददाता
संवाददाता के आवश्यक गुण

कभी भी कामयाब पत्रकार अथवा संवाददाता अपने आप जन्म नहीं लेता। वह पैदा नहीं होता, बल्कि पैदा किया जाता है, बनाया जाता है। पत्रकारिता में सफलता प्राप्त करने के लिए कुछ आवश्यक गुणों की आवश्यकता होती है, जिसके कारण वह किसी भी क्षेत्र में सफलताओं की सीढ़ियां चढ़ता रहता है। ये आवश्यक गुण कुछ इस प्रकार हैं- ईमानदारी, साहस, धैर्य, सावधानी, बुद्धिमत्ता, विद्वता, मित्रता, दया, भरोसा, सामाजिक दर्द, जिज्ञासु होना उसके लिए जरूरी है। निरीक्षक, समीक्षक, आलोचक दृष्टि, कल्पना शक्ति, दूरदृष्टि, चतुरता, मुस्तैदी, प्रसन्नता, चालाकी, आशावादिता, विनोदीवृत्ति, सुरक्षात्मक दृष्टि आदि उसके व्यक्तित्व के लिए बेहद जरूरी हैं।

बहुत सारे विद्यार्थी सोचते होंगे कि पत्रकारिता के प्रशिक्षण में ‘‘समाचार कैसे लिखे जाते हैं ?’’ केवल यही बताया जाता है। कुछ विद्यार्थी ऐसे भी होते हैं, जो साहित्यिक आकांक्षा से उत्प्रेरित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में पधारते हैं। किन्तु दुर्भाग्य से पत्रकारिता में केवल ‘‘लेखन’’ ही नहीं होता। इस क्षेत्र में अतिसुन्दर भाषा, शैली, मुहावरे और साहित्य संबंधी जानकारियों से अधिक कल्पना शक्ति, दूरदृष्टि ओर सोच-विचार करने की क्षमता महत्वपूर्ण होती है। पत्रकारिता से इस धरती पर जितने भी विषय है, उदाहरण के तौर पर अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, विज्ञान, रसायन विज्ञान, इतिहास, भूगोल शास्त्र आदि असंख्य विषयों का विषय होता है। जिन विद्यार्थियों का इन विषयों से परिचय नहीं हैं, उनको पत्रकारिता क्षेत्र में कदम बढ़ाने से पहले इन विषयों से अच्छी तरह परिचित होना चाहिए।

संवाददाता बहुत प्रभावशाली व्यक्ति होता है। समाचार पत्र में समाचार कैसे छापें, इसे निश्चित करने वाला कोई और नहीं होता, बल्कि संवाददाता ही इस बात को तय करता है। वैसे समाचार संगठन के दूसरे व्यक्ति भी होते हैं, परन्तु संवाददाता ही वह पहला व्यक्ति होता है, जो निर्णय लेता है कि किस घटना तथा समाचार को किस प्रकार रिपोर्ट करें ? दूसरे शब्दों में संवाददाता ही समाचार इकट्ठा करने और उसका सही ढंग से संगठन करने का कार्य करता है। यह भी सत्य है कि एक संवाददाता संपादक भी अच्छा होता है। एक अच्छा संवाददाता हर समय एक अच्छे संपादक के गुणों को धारण करने की कोशिश करता है।
पत्रकारिता के इस पेशे का सबसे बड़ा रोग है-‘सर्वद्वेषी’। एक पत्रकार को इस रोग से सतर्क रहना बहुत जरूरी है। लेकिन आलोचक की दृष्टि एक पत्रकार की सबसे बड़ी पूँजी है। पत्रकार की यह कोशिश होती है कि वह परिपक्व बने। उसका हर काम निर्दोष हो, यही उसकी आकांक्षा होती है।

समाचार संगठन में श्रेणियां और कार्य

कोई भी संवाददाता समाचार पत्र का महत्वपूर्ण सदस्य होता है। वह सबसे पहले संवाददाता है। वह समाचारों को इकट्ठा करता है और उसको शुद्ध तथा सुन्दर बनाता है। समाचार पत्र संस्था के दूसरे सदस्य संवाददाता की भेजी हुई रिपोर्ट को सही ढंग से छापने तथा पढ़ने को आतुर पाठकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह तो सब ठीक है, किन्तु इसका अर्थ यही नहीं कि संवाददाता ही समाचार पत्र संगठन में सब कुछ है। दूसरे सदस्यों के बिना संवाददाता क्या अपने समाचारों को पाठकों तक पहुँचा सकता है, भला क्या यह संभव है ? किसी भी समाचार पत्र संगठन में संपादक का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। समाचारों का संपादन करना, समाचारों को संतुलन के साथ छापना यह कार्य संपादक करता है। एक ही प्रकार के समाचार छापने से पत्र में आकर्षण नहीं रहता, इसलिए हर किस्म के समाचारों को पत्र में जगह देनी होती है।
कोई भी पाठक वर्ग समाचार पत्र को जिस मूल्य पर भी खरीदता है, इससे समाचार की लागत से बहुत कम लाभ होता है। इस घाटे के लिए संगठन में कुछ सदस्य ऐसे भी होते हैं, जो विज्ञापन लाते हैं। इन विज्ञापनों से सभी सदस्यों का मासिक वेतन निकल आता है।
संगठन में कुछ सदस्य पाठकों तथा समाचार पत्र को समय पर पहुँचाने का कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त समाचार पत्र छापने वाले सदस्य भी संगठन के महत्वपूर्ण भाग होते हैं। इस प्रकार इन तीन श्रेणियों में काम होता है।
1.लिखाई। 2.छपाई। 3.बिक्री।
समाचार पत्र का यह कार्य यानी लिखाई, छपाई और बिक्री संगठन के सभी सदस्य संपादकीय विभाग, तकनीकी विभाग और व्यापार विभाग तीनों मिलकर करते हैं।

संपादकीय विभाग

कोई भी समाचार इकट्ठा होने के बाद संपादन का कार्य आरंभ होता है। संपादक समाचारों की भाषा की त्रुटियाँ दूर करते हुए, रूचिकारक और पठनीय बनाता है। संपादक विभाग का दूसरा कार्य मनोरंजक संपादकीय लेख और विशेष लेख लिखकर पाठकों का मनोरंजन करना होता है।

तकनीकी विभाग

जब संपादन की प्रक्रिया समाप्त होती है उसके बाद छपाई का तकनीकी कार्य आरंभ होता है। यह कार्य तकनीकी विभाग करता है। कम्प्यूटर पर समाचार पत्र का ब्लू प्रिन्ट बन जाने के बाद उसकी प्लेट बनायी जाती है, फिर आफसेट तथा रोटोग्रेव्होर छपाई मशीनों पर छपाई का काम आरंभ होता है।

व्यापार विभाग

इस भाग में विज्ञापन लेना और पाठक वर्ग निर्माण करना इसके अलावा सभी प्रकार का वित्तीय कार्य होता है। इस विभाग से सभी कर्मचारियों के वेतन भी दिये जाते हैं। छोटे-छोटे समाचार पत्रों में अलग-अलग विभाग नहीं होते। किन्तु बड़े समाचार पत्र संगठनों में हर विभाग स्वतंत्र रूप से कार्य करता है। विज्ञापन विभाग, तकनीकी विभाग, सम्पादकीय विभागों के अतिरिक्त सर्क्युलेशन विभाग और प्रबन्धक विभाग भी होते हैं, जो क्रमशः समाचार पत्र के सर्क्युलेशन और सभी विभागों का प्रबन्धन का कार्य किया जाता है।
समाचार पत्र संगठन के सब से ऊपर मालिक प्रशासक होता है। मालिक तथा प्रशासक कोई भी व्यक्ति, संघ, साझेदारी में या संयुक्त पूँजी पर निर्धारित हो सकता है। भारत में 90 प्रतिशत समाचार संस्थाओं में मालिक ही प्रशासक और संपादक बना रहता है। बड़े और मध्यम प्रकार के समाचार पत्रों में संपादन, वितरण वगैरह सभी कार्यों को संपादक ही करता है। मुख्य संपादक को सहायता देने के लिए कभी कभार सहायक तथा प्रबंधकीय संपादक भी होते हैं। मुख्य संपादक संपादकीय विभाग, व्यवसाय विभाग और तकनीकी विभाग इन तीनों विभागों पर नियन्त्रण करता है। किन्तु संपादकीय विभाग पूर्णतः मुख्य संपादक के नियोजन में ही कार्य करता है। इसको सहायता देने के लिए समाचार संपादक या सहायक समाचार संपादक होते है। संपादकीय विभाग दो विभागों में बँटा हुआ है- (1) रिपोर्टिंग विभाग। (2) संपादकीय विभाग। रिपोर्टिंग विभाग में अनेक प्रकार के संवाददाता काम करते हैं।

राष्ट्रीय संवाददाता

अब आइये यह देखें, राष्ट्रीय संवाददाता बनने के लिए किन गुणों की आवश्यकता होती है ? यह राष्ट्रीय स्तर के संवाददाता में सबसे महत्वपूर्ण गुण तो यह होना चाहिए कि वह खोजी वृत्ति का हो, इसके अतिरिक्त समीक्षा, निरीक्षण, आलोचना करने की क्षमता के साथ-साथ राष्ट्र के महत्वपूर्ण विषयों पर गहरी नजर रखने की क्षमता राष्ट्रीय संवाददाता में अवश्य होनी चाहिए।

विदेशी संवाददाता

यह संवाददाता बहुत ही वरिष्ठ होते हैं। भारत के 20,000 संवाददाताओं में सिर्फ 2 प्रतिशत संवाददाताओं को विदेशी राष्ट्रों में नियुक्त किया जाता है। संवाददाता के जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षा विदेशों में नियुक्त विशेष संवाददाता बनना होता है। यह सबसे बड़ा सौभाग्य तथा इनाम है।

समाचार-लेखन

किसी भी प्रकार का लेखन विशेष शैली में लिखा जाता है। उपन्यास हो, आत्मचरित्र हो, निबंध हो या नाटक हो, कविता हो, हर प्रकार के लेखन की पद्धति तथा शैली का एक विशेष ढंग होता है।

समाचार का संगठन

समाचार लेखन विविध प्रकार से लिखे जाते हैं, संगठित किये जाते हैं। लेकिन समाचार लेखन के साधारणतः तीन भाग होते हैं-पहला भागः समाचार प्रवेश अथवा प्रारम्भिक कहलाता है। अंग्रेजी में इसे इन्ट्रो तथा लीड कहते हैं। मध्य भाग को कलेवर (बॉडी) और अंतिम भाग को निर्णय कहते हैं।
समाचार प्रवेश (इन्ट्रो) अनेक प्रकार से लिखा जाता है। साधारणतः इस भाग में समाचार सारांश होता है, जोकि छः प्रश्नों के उत्तर पर निर्भर होता है।
‘‘क्या ? कहाँ ? कब ? क्यों ? किसको ? और कैसे ?
इन छः ककारों को अंग्रेजी में 5 W+ 1 H कहा जाता है।
कलेवर (बॉडी) में समाचार लेख के सारांश का विस्तार दिया जाता है। कलेवर संक्षिप्त भी हो सकता है और विस्तृत भी। एक ही अनुच्छेद में लेखन में समाचार प्रवेश तथा कलेवर दोनों एकसाथ लिखे जाते हैं, अलग-अलग नहीं।
समाचार लेखन के अंतिम भाग में समाचार निर्णय लिखना आवश्यक नहीं होता। जो कुछ भी विचार प्रकट करना है, वह पहले ही अनुच्छेदों में यानी समाचार प्रवेश में ही कहा जाता है। लेकिन कुछ लेखों में निर्णय भी लिखा जाता है।

समाचार की रचना

एक ही समाचार का लेखन जो कि जटिल भी नहीं है, यदि लिखना हो, जिसमें केवल एक ही विषय तथा विचार का लोन करना हो, ऐसी घटनाओं अथवा समाचारों को ‘‘उल्टा त्रिकोण’’ पद्धति से लिखा जाता है। इस पद्धति में सबसे महत्वपूर्ण विषय या मुद्दे को पहली पंक्तियों में या वाक्यों में लिखा जाता है। कम महत्व वाले मुद्दों को कलेवर (बॉडी) में लिखा जाता है। उल्टी त्रिकोणी रचना में निर्णय का उल्लेख नहीं किया जाता। इस प्रकार की रचना में यह लाभ होता है कि आवश्यकतानुसार समाचार पत्र में जगह की तंगी को देखते हुए नीचे की ओर कांटा छांटा जा सकता है। कटाई-छटाई से समाचार का मुख्य अंग छूट नहीं जाता। दूसरा लाभ यह होता है कि पाठक यदि गड़बड़ी में पहले अनुच्छेद के कुछ ही वाक्य पढ़ लेता है तो वह समाचार के मुख्य अर्थ से वंचित नहीं रहता।
1. समाचार प्रवेश (इंट्रो)
2. कलेवर (बॉडी)
3. निर्णय

समान-तथ्य-लेखन

कुछ समाचार लेख ऐसे भी होते हैं, जो ‘‘उल्टे त्रिकोण’’ पद्धति तक सीमित नहीं रहते। कुछ लेखों में सभी मुद्दे महत्वपूर्ण होते हैं। किसी एक अनुच्छेद को काटना हानिकारक होता है। महत्व के अनुसार सविस्तार जानकारी लिखना आवश्यक होता है। इस प्रकार के लेख साधारणतः विशेष पद्धति से लिखे जाते हैं।

उदाहरण

इलाहाबाद। अगस्त 27 इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने विश्वविद्यालय में इस वर्ष से नौकरी दिलाने वाले तीन व्यावसायिक पाठ्यक्रम खोले जाएंगे। विश्वविद्यालय के प्रेस नोट में यह बात बतायी गयी है।
विश्वविद्यालय ने दो साल के पर्सनल मैनेजमेंट कोर्स के लिए 40 सीटों की अनुमति दी है, जिसे बिजनेस मैनेजमेंट के विभाग में चलाया जाएगा। प्रवेश की सूचना पहले हिस्से में जारी की गयी है।
मास्टर्स इन विजुअल के एक और कोर्स के लिए 25 सीटों की अनुमति दी गयी है। यह दो वर्षीय व्यावसायिक कोर्स आर्ट कॉलेज में चलाया जाएगा। प्रवेश संबंधी सूचना कल जारी की जाएगी।
तीन वर्षीय मास्टर्स इन कम्प्यूटर एप्लीकेशन के लिए 80 सीटों की व्यवस्था की गई है, अगले सप्ताह प्रवेश संबंधी सूचना जारी की जाएगी।
इन पाठ्यक्रमों में रूचि रखने वाले विद्यार्थी संबंधित विभागों से तुरन्त संपर्क करें।
इस समाचार लेखन पद्धति में पहले अनुच्छेद में तीन पाठ्यक्रमों का उल्लेख है। कलेवर में तीन पाठ्यक्रमों के संबंध में विस्तार पूर्वक जानकारी का उल्लेख जरूरी है। नहीं तो पाठक यह प्रश्न पूछेगा कि दूसरे कोर्स का क्या हुआ ? शेष कोर्सों की जानकारी कहाँ है ?
इस प्रकार से अनेक अवसरों पर समाचार प्रवेश के पहले अनुच्छेद के साथ-साथ समान महत्व वाले तथ्यों का विवरण देना अनिवार्य हो जाता है।

काल-क्रम के अनुसार समाचार की रचना

जब कभी समाचार लेखों के क्रमानुसार लिखित घटनाओं का विवरण दिया जाता है, तो इस प्रकार की घटनाओं के संगठन की समस्या केवल ‘‘कालक्रम’’ से ही दूर हो सकती है। कालक्रमानुसार समाचार का लेखन किस प्रकार किया जाता है। आइए देखें-

उदाहरण

इलाहाबाद। अगस्त 5 इलाहाबाद पुलिस ने बन्दूक की नोक पर बैंक लूट कर फरार होने वाले एक खतरनाक लुटेरे की तलाशी के लिए बड़े पैमाने की मुहिम शुरू की है, जो करीब 55 लाख रुपये लेकर फरार हुआ।
शहर से दूर फाफामऊ पर स्थित एस.बी.आई. की शाखा में एक घनी दाढ़ी वाला खतरनाक लुटेरा घुस गया। दोपहर के 1 बजकर 40 मिनट पर कैशियर मिस्टर आर. सिंह अपना हिसाब किताब बन्द कर रहे थे कि यकायक लुटेरे ने अन्दर घुसकर कैशियर पर बन्दूक तान दी। कैशियर की ओर एक थैला फेंकते हुए उसमें रुपये भरने को कहा।
घबराते हुए मिस्टर सिंह ने रुपये भरने के बाद लुटेरे को लौटा दिया। रुपये हथिया लेने के बाद कैशियर को चुप चुप कहते हुए नीचे बैठने का हुक्म देते हुये लुटेरा भाग खड़ा हुआ। थोडी़ देर के बाद कैशियर ने वाचमैन को चिल्लाते हुए आवाज दी, तब तक लुटेरा भाग चुका था।
साभार - पत्रकारिता/जनसंचार

Friday, 20 July 2012

राष्ट्रपति चुनाव का राजनीतिक गणित
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भारत में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल 25 जुलाई 2012 को समाप्त हो रहा है. इसी महीने देश के 13वें 

राष्ट्रपति को चुना जाएगा.
निर्वाचन अप्रत्यक्ष मतदान से होता है. जनता की जगह जनता के चुने हुए प्रतिनिधि राष्ट्रपति को चुनते हैं.
राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचन मंडल या इलेक्टोरल कॉलेज करता है.इसमें संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं.
दो केंद्रशासित प्रदेशों, दिल्ली और पुद्दुचेरी, के विधायक भी चुनाव में हिस्सा लेते हैं जिनकी अपनी विधानसभाएँ हैं.
चुनाव जिस विधि से होता है उसका नाम है – आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल हस्तांतरणीय मत द्वारा .
राष्ट्रपति चुनाव की वर्तमान व्यवस्था 1974 से चल रही है और ये 2026 तक लागू रहेगी.
इसमें 1971 की जनसंख्या को आधार माना गया है.
वोट का मूल्य
राष्ट्रपति चुनाव में अपनाई जानेवाली आनुपातिक प्रतनिधित्व प्रणाली की विधि के हिसाब से प्रत्येक वोट का अपना मूल्य होता है.
सांसदों के वोट का मूल्य निश्चित है मगर विधायकों के वोट का मूल्य अलग-अलग राज्यों की जनसंख्या पर निर्भर करता है.
निर्वाचन मंडल

सदस्यएक वोट का मूल्यसदस्य संख्यावोट(लगभग 11 लाख)
निर्वाचित सांसद708776लगभग साढ़े पाँच लाख
निर्वाचित विधायकराज्य की जनसंख्या पर निर्भर4120लगभग साढ़े पाँच लाख

जैसे देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश के एक विधायक के वोट का मूल्य 208 है तो सबसे कम जनसंख्या वाले प्रदेश सिक्किम के वोट का मूल्य मात्र सात.
प्रत्येक सांसद के वोट का मूल्य 708 है.
भारत में अभी 776 सांसद हैं. 543 लोकसभा सांसद और 233 राज्य सभा सांसद.
776 सांसदों के वोट का कुल मूल्य है – 5,49,408 (लगभग साढ़े पाँच लाख)
भारत में विधायकों की संख्या है 4120.
इन सभी विधायकों का सामूहिक वोट है 5,49,474 (लगभग साढ़े पाँच लाख)
इसप्रकार राष्ट्रपति चुनाव में कुल वोट हैं – 10,98,882 (लगभग 11 लाख)
समीकरण
यूपीए की स्थिति
पार्टीसांसदविधायकवोट(लगभग)
कांग्रेस27711773,30,000
तृणमूल2819948,000
डीएमके252522,000
एनसीपी169424,000
आरजेडी6279,000
एनसी5285,500
मुस्लिम लीग2204,500
जेवीएम2113,500
एआईएमआईएम172,000
बीपीएफ2123,000
केरल कांग्रेस192,000
आरएलडी696,000
एलजेपी111100
कुल37216194,60,000

राष्ट्रपति चुनाव में जीत के लिए चाहिए – 5,49,442 वोट (लगभग साढ़े पाँच लाख वोट)
फिलहाल यूपीए के पास उसके सभी सांसदों और सभी विधायकों के वोटों को मिलाकर कुल वोट हैं – 4,60,191
एनडीए के पास सभी सांसदों और विधायकों को मिलाकर कुल वोट हैं – 3,04,785
ऐसी पार्टियाँ, जो ना तो यूपीए में हैं, ना ही एनडीए में, उनके वोट हैं – 2,60,000 से ज्यादा.
कुछ अन्य छोटी पार्टियों के पास भी 70,000 से ज़्यादा वोट हैं.
स्पष्ट है कि ना तो यूपीए और ना ही एनडीए अपने दम पर राष्ट्रपति चुन सकते हैं.
दोनों ही को दूसरी पार्टियों का सहयोग चाहिए.
इसी कारण इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों के क्षेत्रीय नेताओं मुलायम सिंह यादव, शरद पवार, ममता बनर्जी, नीतिश कुमार जैसे नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है.
क्षेत्रीय दल
चुनाव में सबसे अधिक वोट वाला प्रदेश है उत्तर प्रदेश. वहाँ के विधायक के वोट का मूल्य 208 है.
यूपी की दोनों मुख्य पार्टियाँ, एसपी और बीएसपी, ना तो यूपीए के साथ हैं ना एनडीए के.
दोनों के पास मिलाकर लगभग 1,15,000 वोट हैं.
एनडीए की स्थिति
पार्टीसांसदविधायकवोट (लगभग)
बीजेपी1638252,25,000
जेडी (यू)3012142,000
एसएडी75711,500
शिवसेना154518,500
जेएमएम2184,500
एजीपी3103,000
एचजेसी111000
कुल2211,0773,05,000

वहाँ 27 सांसदों और 230 विधायकों वाली सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के पास लगभग 67000 वोट हैं.
मायावती की बीएसपी के पास लगभग 46,000 वोट हैं.
पश्चिम बंगाल में एक विधायक के वोट का मूल्य 151 है.
वहाँ 25 सांसदों और 199 विधायकों वाले सत्ताधारी तृणमूल के पास लगभग 46,000 वोट हैं.
इसी तरह महाराष्ट्र में शरद पवार की पार्टी एनसीपी के पास लगभग 23,000 वोट हैं.
बिहार में नीतिश कुमार की पार्टी जेडी(यू) के पास लगभग 41,000 वोट हैं.
ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए सबसे बेहतर उपाय यही है कि वो आपसी सहमति बनाने की कोशिश करे.
अन्य दल
पार्टीसांसदविधायकवोट (लगभग)
एसपी3023069,000
बीएसपी369143,000
एआईएडीएमके1415837,000
लेफ़्ट3919652,000
बीजेडी2010330,000
टीडीपी118620,500
जेडी (एस)3306,000
पीडीपी0221,500
टीआरएस2123,000
कुल1559282,62,000
अन्य छोटे दल71,500

कांग्रेस और बीजेपी के संबंध बहुत मधुर नहीं हैं, इसलिए इस चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियाँ अपनी अहमियत का लाभ उठाने का प्रयास कर सकती हैं.
इसलिए कांग्रेस चाहेगी कि यूपीए एकजुट रहे और ममता बनर्जी तथा शरद यादव जैसे क्षेत्रीय नेता उसकी पसंद का साथ दें.
वहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का झुकाव भी यूपीए की तरफ है. ऐसे में यूपीए के लिए स्थितियाँ जटिल अवश्य हैं मगर कठिन नहीं.
मगर संख्याबल और मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के आधार पर बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को लिए राह आसान नहीं.
उसके लिए अपनी पसंद के राष्ट्रपति को चुनवाने लायक बहुमत जुटाना अधिक कठिन है.
बीजेपी को इसके लिए अपने पूर्व सहयोगियों - बीएसपी, टीएमसी, एआईएडीएमके, बीजेडी, टीडीपी और जेडी (एस) - से सहयोग माँगना पड़ सकता है.
और बात इतने से भी नहीं बनेगी. उन्हें तब भी समाजवादी पार्टी का सहयोग चाहिए होगा.
ज़ाहिर है बीजेपी के लिए अपने दम पर किसी को राष्ट्रपति बनवा सकना बहुत कठिन है.
गठबंधन की पार्टियाँ
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(यूपीए)कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), नेशनल कॉन्फ़्रेंस (एनसी), मुस्लिम लीग, झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम), ऑल इंडिया मुस्लिमे इत्तेहादुल मुसलमीन, (एआईएमआईएम), बोडोलैंड पीपुल्स फ़्रंट (बीपीएफ़), केरल कांग्रेस, राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी), लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी)
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए)भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), जनता दल युनाईटेड (जेडी यू), शिरोमणि अकाली दल (एसएडी), शिव सेना, झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम), असम गण परिषद (एजीपी), हरियाणा जनहित कांग्रेस (एचजेसी)

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